Thursday, April 26, 2018

गंगा माँ-चंद दोहे

गंगा माँ-चंद दोहे--ओंम प्रकाश नौटियाल

गंगा माँ करती रही ,  हृदय प्राण संत्राण 
ताप मुक्ति कष्ट निवृति, वर्णित वेद पुराण

शुचिता सारी  चढ रही, लोभ , मोल की भेंट
शोषक के बस स्वार्थ से, पोषक मटियामेट

संसाधन हैं कम नहीं , चाहत पर अवरुद्ध
वर्षो से हम माँ तुझे  ,कर न सके पर शुद्ध

धन व्यय तक सीमित है , गंगा का अभियान
अब तक ना गोचर हुई, क्षणिक तनिक भी जान

संस्कृति के पर्याय हैं , नदी नार औ’ नीर
इनको पहुँचे पीर तो, बात बहुत गंभीर

गंगा से इतिहास है , गंगा से भूगोल
जीवन के हर मूल्य का, इसके जल से तोल

जीव तत्व की  बूंद में , माँ तेरा  है  जोड़
लज्जित हमने कर दिया, गाद कीच की छोड

माँ के तेज प्रताप का, वर्णित है गुणगान
तारण सगर पुत्रों का, कष्ट निवृति निर्वाण
-ओंम प्रकाश नौटियाल, बड़ौदा , मोबा.9427345810

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