Thursday, October 8, 2015

अनपढ़ ज्ञानी

कहानी- ऒंम प्रकाश नौटियाल
[यह कहानी "अनपढ़ ज्ञानी’ तथा अर्चना नौटिय़ाल जी की कहानी "जाखू वाली माया " त्रैमासिक पत्रिका  साहित्य सरोज में प्रकाशनार्थ २२.४.१५ को भेजी थी । "जाखू वाली माया"  अर्चना जी ने अलग से मेल की थी ।प्रत्युत्तर में  अखण्ड गहमरी जी  का निम्न संदेश  २ जून २०१५ को प्राप्त हुआ
"प्रणाम इंस अंक में आन्‍टी जी की रचना प्रकाशित हो गई है पुस्‍तक 6 जून से उपलब्‍ध होगी गुरूवर।
आपकी रचना को अगस्‍त-सितम्‍बर के लिए रोक लिया गया "
बाद में अगस्त सितम्बर किन्ही कारणों से प्रकाशित नहीं हुआ ।
अर्चना की कहानी वाला अंक जुलाई में यहाँ प्राप्त  हो गया था ।]
अनपढ ज्ञानी  ( एक लघु कथा ) -ओंम प्रकाश नौटियाल
(बडौदा, गुजरात , मोबा. 9427345810)


माँगे लाल पिछले बीस साल से गाँव प्रधान थे । प्रधानी में भी अब बडा पैसा हो गया है सो उन्होंने भी खूब बटोरा । दबंगी से कई जमीनों पर भी कब्जा किया यानि अब वह अच्छी खासी हैसियत के मालिक, इज्जतदार आदमी बन गये थे । रमेश नाम का एक ही लडका 
था उसे पढाने की उन्होंने जरूरत नहीं समझी । किसलिए समय बरबाद करवाना है , खेलेगा, कूदेगा , साथ रहेगा तो कई तरह के हथकण्डे और हुनर  सीखेगा जो असल जिंदगी में काम आएंगे आखिर इतनी जमीन जायदाद , बाग , बगीचे उसे ही तो देखने हैं ।
पच्चीस साल का होने पर उन्होंने उसकी शादी दस बारह कि. मी. दूर के एक गाँव में तय कर दी ।
सुन्दर , ग्रेजुएट कन्या थी । कन्या वाले पैसों की हैसीयत में मागेंलाल के सामने नहीं ठहरते थे किंतु शादी इतने बडे घर में होने पर वह 
बहुत खुश थे फिर उन्हें बताया गया था कि लडका भी बी ए है ।

शादी इसी महीने की सत्ताइस तारीख को थी यानि दो सप्ताह से भी कम का समय रह गया था । 

आज सुबह माँगे लाल जब गाँव का चक्कर लगा कर आए तो कुछ परेशान लग रहे थे , दरअसल    बिरजू ठेकेदार ने उन्हें एक खबर सुनाई थी कि कानपुर के एक गाँव में एक लडकी ने बारात लौटा दी और शादी करने से मना कर दिया क्यों कि उसे पता लगा कि लडका निपट अनपढ है । यह बात उससे छुपाई गई थी पर बारात आने के बाद किसी सूत्र से यह बात लडकी के कानों तक पहुंच गई , उसने यह बात अपनी बहनो और सहेलियों से साझा की । लडकियों ने फेरों से ठीक पहले मंडप में बैठे दुल्हे से पूछ लिया कि बताइए पंद्रह और छः का योग क्या होता है। दुल्हे ने तत्परता से उत्तर दिया कि सत्रह । फिर क्या था लडकी ने फेरे लेने से मना कर दिया । दुल्हे के पिता और बरातियों की मान मनुहार के बाद भी लडकी टस से मस नहीं हुई , लिहाजा बारात बैरंग लौट गई ।

माँगे लाल को एक तो यह डर सता रहा था कि कहीं बिरजू ने यह खबर जानबूझ कर उसे  डराने या ब्लैक मेल करने के उद्देश्य से तो नहीं सुनाई । वह वैसे भी उनसे ईर्ष्या करता था प्रधानपद के पिछले दो चुनाव से वह माँगेलाल से हार रहा था ।
कहीं अब यह जाकर लडकी वालों के कान तो नहीं भर देगा । लडके से बात करना फिजूल था कहीं घबराकर शादी से ही मना न कर दे । इसी पशोपेश में उन्होंने ’ देखा जाएगा’ की नीति अपनाते हुए सब कुछ भाग्य पर छोड़ दिया ।

दिन गुजरते गए और विवाह तिथि  भी आ गई । बारात नियत समय पर पहुंच गई । कई पारम्परिक  रस्में निबाहने के बाद फेरों का वक्त आ गया और दुल्हा ,बाराती मुहुर्त के समय रात 11 बजे मण्डप में पहुंच गए । अब तक कुछ नहीं हुआ , माँगे लाल कुछ निश्चिंत दिखाई दिए , बस थोडा समय और ऐसे ही बीत जाए , फेरे पड़ जाएं , फिर सब ठीक हो जाएगा ।

किंतु माँगे लाल  की बदकिस्मती से लडके के अनपढ होने की बात फेरों से ठीक पहले लडकी तक पहुंच  चुकी थी । बिरजू शायद पूरी बिरादरी के सामने उन्हें नीचा दिखाने की सोच चुका था । लडकी इस खबर से अत्यंत व्यथित हो गई और उसने भी इस बात की तसल्ली के लिए कानपुर वाले गाँव का तरीका ,जिसे सभी अखबारों ने तब बड़ी प्रमुखता से छापा था, अपनाने के लिए  अपनी छोटी बहन और तीन सहेलियों को फेरों से ठीक पहले यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंप दी । चारों लडकियाँ मंडप में पहुंची और सीधे दुल्हे को संबोधित कर बोली , " दुल्हे राजा पहले यह बताइए कि ग्यारह और आठ मिलकर कितने होते हैं ।" दुल्हे मिंयाँ इस अचानक हुए हमले से थोडे असंयत हुए फिर यह सोचकर  कि सालिय़ाँ मजाक कर रही हैं, बोले , " वाह जी , बडा मजेदार मजाक है । " लडकियाँ कुछ तेज स्वर में बोली , " दुल्हे राजा, हम एक दम गंभीर है , अगर फेरे डालने हैं तो आपको इसका सही जवाब तुरंत देना होगा ।" दुल्हे मिय़ाँ भीतर तक हिल गये । यह क्या मुसीबत आ गई है । रमेश के दिमाग में तीन संभावित उत्तर कौंध रहे थे किंतु वह गलत बोलने का जोखिम नहीं  उठाना चाहता था । उसने अपने को मजबूत किया और चेहरे पर भयंकर क्रोध का आवरण ओढ कर आवेश के साथ एक कुशल अभिनेता की तरह अपने संवाद  कुछ यूं बोले , " यह कैसा मजाक है ? मुझे क्या मूर्ख समझा है ?  पहली कक्षा का सवाल मुझसे पूछ कर  आपलोगों ने मेरा भरे मंडप में घोर अपमान किया है और मेरी शिक्षा का मजाक बनाया है , मुझे भी ऐसे घर से नाता नहीं जोडना है जहाँ ऐसे छिछोरे लोग हों ।" यह कहते ही वह उठ खडा हुआ और द्वार की ओर मुडने लगा । तभी लडकी के पिता लडके के पैरों में गिर पडे ," नही , नहीं बेटा , यह बच्चियाँ है , इन्हे समझ नहीं है मैं क्षमा माँगता हूं । मुहूर्त का समय हो रहा है , देर मत करो।" और फिर दुल्हे और बारातियों की मनुहार के साथ शादी संपन्न हुई ।

बारात विदाई के समय माँगे लाल ने रमेश के कान में कहा , " वाह बेटा , तू तो मेरा भी बाप हो गया है, मान गया तुझे । मैं तो पहले ही जानता  था कि जिंदगी में किताबी ज्ञान से ज्यादा जरुरी है कूटनीति सीखना । यही हर मुसीबत की खेवन हार है । शाबास जीते रहो , तेरे अंदर खानदानी नेतागिरि कूट कूट कर भरी है , तू बहुत तरक्की करेगा । आज तूने मेरी सभी शंकाएं  निर्मूल साबित कर दी "

उधर लडकी वाले मन ही मन लडकी के भाग्य़ पर प्रसन्न हो रहे थे किंतु  बिटिया की  बिदाई पर सबका मन भारी भी हो रहा था ।  बैन्ड़ वाले बजा रहे थे 
"बाबुल की दुआएं लेती जा ........" 
-ओंम प्रकाश नौटियाल
(बडौदा, गुजरात , मोबा. 9427345810)
कहानी

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