Monday, September 26, 2011
बेटी
-ओंम प्रकाश नौटियाल
अंधेरों से किया निबाह कि चिराग हो रोशन,
बेटी ही सहारा है जिसे समझा ’पराया धन’ !
पुत्री आयी अनचाही, थी इच्छा और पुत्र की,
तनया प्राण से समर्पित, है बेटा कहीं मगन !
जाने कन्या जन्म पर, क्यों मुरझा गये सारे,
मानों उनके सभी स्वप्न, हुए आज हों दहन !
अजन्य, अनर्थक, अनिमित्त सा जिसे जाना,
कभी शक्ति स्वरूप दुर्गा,कभी मलयजा पवन !
ममतामयी, प्रिया अनुरक्ता,अंतरग अनुरागी,
हो रूप माता या पत्नी का, बेटी हो या बहन !
जिस घर में नारी का स्नेह संसार बसता हो,
सदा रहा सुगन्धित है, हुआ मानों अभी हवन !
अंधेरों से किया निबाह कि चिराग हो रोशन,
बेटी ही सहारा है जिसे समझा ’पराया धन’ !
पुत्री आयी अनचाही, थी इच्छा और पुत्र की,
तनया प्राण से समर्पित, है बेटा कहीं मगन !
जाने कन्या जन्म पर, क्यों मुरझा गये सारे,
मानों उनके सभी स्वप्न, हुए आज हों दहन !
अजन्य, अनर्थक, अनिमित्त सा जिसे जाना,
कभी शक्ति स्वरूप दुर्गा,कभी मलयजा पवन !
ममतामयी, प्रिया अनुरक्ता,अंतरग अनुरागी,
हो रूप माता या पत्नी का, बेटी हो या बहन !
जिस घर में नारी का स्नेह संसार बसता हो,
सदा रहा सुगन्धित है, हुआ मानों अभी हवन !
मोह बंधन
ओंम प्रकाश नौटियाल
प्रबल मोह पाश से
स्नेहसिक्त मिठास से
अर्चना उपवास से
सदभावना विश्वास से
निर्मल पावन मन से,
सृष्टि के उदगम से
नारी ने सबको
निज दास बना रक्खा है !
कर्म धर्म जाप हो
क्रंदन, प्रलाप हो
दुख हो विलाप हो
किसी का संताप हो
सर्वहारी नारी ने,
पत्नी महतारी ने,
बेटी , बहन प्यारी ने,
जीवन में सबके
उल्लास बना रक्खा है,
सृष्टि के प्रारंभ से
निज दास बना रक्खा है !
बंधकर कई बंधन में
इस जग प्रांगण में
निष्ठ, शिष्ट आचरण से
द्दढ़ता से प्रण से,
सबके जीवन में
सुवासित सा सुन्दर पलाश
खिला रक्खा है,
नारी ने सदियों से
निज दास बना रक्खा है !
प्रबल मोह पाश से
स्नेहसिक्त मिठास से
अर्चना उपवास से
सदभावना विश्वास से
निर्मल पावन मन से,
सृष्टि के उदगम से
नारी ने सबको
निज दास बना रक्खा है !
कर्म धर्म जाप हो
क्रंदन, प्रलाप हो
दुख हो विलाप हो
किसी का संताप हो
सर्वहारी नारी ने,
पत्नी महतारी ने,
बेटी , बहन प्यारी ने,
जीवन में सबके
उल्लास बना रक्खा है,
सृष्टि के प्रारंभ से
निज दास बना रक्खा है !
बंधकर कई बंधन में
इस जग प्रांगण में
निष्ठ, शिष्ट आचरण से
द्दढ़ता से प्रण से,
सबके जीवन में
सुवासित सा सुन्दर पलाश
खिला रक्खा है,
नारी ने सदियों से
निज दास बना रक्खा है !
हाल-ए-हिन्दी
-ओंम प्रकाश नौटियाल
साँसत में हिन्दी है कि आया फ़िर पखवाडा
मात्र दिखावे की खातिर बाजेगा ढ़ोल नगाडा
कब तक ढ़ोयेगा भारत यूं अंग्रेजी का भार
दिखावे के लिये होगा, बस हिन्दी का प्रचार
गर्वीली शर्मीली हिन्दी, अंग्रेजी हैलो हाय
हिन्दी का हक़ मारते लाज तनिक न आय
करोडों की भाषा क्यों हो दया की मोहताज
शिक्षा सफ़ल तभी,जो हो स्वभाषा पर नाज
चले गये अंग्रेज,अंग्रेजी के हैं अब भी ठाठ
हिन्दी देश में जोह रही निज पारी की बाट
पखवाडे भर जश्न है फ़िर लम्बा बनवास
देश में अब तक यही हिन्दी का इतिहास
कितने पखवाडे हुए पर चली अढाई कोस
कार्यालयों में हिन्दी लगे, मानों हो खामोश
हिन्दी के गले में अटकी, अंग्रेजी की फाँस
बेटी की अपने ही घर आफ़त में है साँस
फिर आया पखवाडा सुन, हिन्दी हुई उदास
शेष वर्ष तो कर्मी मुझको नहीं बैठाते पास
भाषा उत्तर दक्षिण की,बंगला हो या सिन्धी
बहनों के लाड़ दुलार से खूब फ़ली है हिन्दी
अंग्रेजी बोली गुरूर से हिन्दी को कर लक्ष्य
पक्ष मना भर लेने से तू आये ना समकक्ष
हृदय से न चाह थी तभी ढीले किये प्रयास
’राजभाषा’ निज देश में घूमे फ़िरे हताश
भाषा जोडेगी वही जिसमें हो माटी की गंध
फिरंगी भाषा कैसे दे, अपनेपन का आनंद
सरकारी पक्ष वर्षों में कर ना सके जो काम
टीवी और हिन्दी फ़िल्मों ने दिया उसे अंजाम
(सर्वाधिकार सुरक्षित )
साँसत में हिन्दी है कि आया फ़िर पखवाडा
मात्र दिखावे की खातिर बाजेगा ढ़ोल नगाडा
कब तक ढ़ोयेगा भारत यूं अंग्रेजी का भार
दिखावे के लिये होगा, बस हिन्दी का प्रचार
गर्वीली शर्मीली हिन्दी, अंग्रेजी हैलो हाय
हिन्दी का हक़ मारते लाज तनिक न आय
करोडों की भाषा क्यों हो दया की मोहताज
शिक्षा सफ़ल तभी,जो हो स्वभाषा पर नाज
चले गये अंग्रेज,अंग्रेजी के हैं अब भी ठाठ
हिन्दी देश में जोह रही निज पारी की बाट
पखवाडे भर जश्न है फ़िर लम्बा बनवास
देश में अब तक यही हिन्दी का इतिहास
कितने पखवाडे हुए पर चली अढाई कोस
कार्यालयों में हिन्दी लगे, मानों हो खामोश
हिन्दी के गले में अटकी, अंग्रेजी की फाँस
बेटी की अपने ही घर आफ़त में है साँस
फिर आया पखवाडा सुन, हिन्दी हुई उदास
शेष वर्ष तो कर्मी मुझको नहीं बैठाते पास
भाषा उत्तर दक्षिण की,बंगला हो या सिन्धी
बहनों के लाड़ दुलार से खूब फ़ली है हिन्दी
अंग्रेजी बोली गुरूर से हिन्दी को कर लक्ष्य
पक्ष मना भर लेने से तू आये ना समकक्ष
हृदय से न चाह थी तभी ढीले किये प्रयास
’राजभाषा’ निज देश में घूमे फ़िरे हताश
भाषा जोडेगी वही जिसमें हो माटी की गंध
फिरंगी भाषा कैसे दे, अपनेपन का आनंद
सरकारी पक्ष वर्षों में कर ना सके जो काम
टीवी और हिन्दी फ़िल्मों ने दिया उसे अंजाम
(सर्वाधिकार सुरक्षित )
Saturday, September 10, 2011
मासूम लडकी
(नेता द्वारा एक मासूम के तथाकथित बलात्कार और शोषण के समाचार पर आधारित)
-ओंम प्रकाश नौटियाल
झलक उसकी पाने को,
यूं ही छत पे जाता था,
घबरायी चोर नजरों से
उधर नजरें घुमाता था,
जाने किन खयालों में, मगर खोयी सी रहती थी,
बडी मासूम लगती थी मुझे सपनों में मिलती थी।
कभी इस ओर देखेगी
गीत मैं गुनगुनाता था,
कभी तो तंद्रा टूटेगी
पैर भी थपथपाता था ,
मगर कोने में बैठी वह, कुछ सोयी सी रहती थी,
बडी मासूम लगती थी मुझे सपनों में मिलती थी।
शीतल सर्द मौसम में
पवन सनसनाती थी,
वह जुल्फ़ें हटाती थी
चूडी खनक जाती थी,
दुपट्टे से ढ़क अंखियाँ , रोयी रोयी सी रहती थी,
बडी मासूम लगती थी मुझे सपनों में मिलती थी।
कभी कमरे को उसके,
मैंने रोशन नही देखा,
तम दूर करने का हो,
उसका मन, नहीं देखा,
अंधेरों को अंधेरों में , वह पिरोई सी रहती थी,
बडी मासूम लगती थी मुझे सपनों में मिलती थी।
एक दिन उधर घर से,
रोना सा सुन कर के,
झाँका जब वहाँ मैने,
छ्त पर चढ़ कर के,
खाली था पड़ा कोना, वह जहाँ सोयी सी रहती थी,
बडी मासूम लगती थी मुझे सपनों में मिलती थी।
उस दिन सुनी मैंने,
जो करुण कहानी थी,
उसकी मौत के पीछे,
सच्चाई वहशियानी थी,
गई खुद छोड दुनिया को, जो खोयी सी रहती थी,
बडी मासूम लगती थी मुझे सपनों में मिलती थी।
किसी दानवी दरिन्दे ने,
दिया जख्म था गहरा,
प्रताडित भी किया उल्टा,
मुरझाया भोला सा चेहरा,
चली ’धिक्कार’ , माँ जिन्दगी ढ़ोयी सी रहती है,
बडी मासूम लगती है मुझे सपनों में मिलती है।
(मेरी पुस्तक "साँस साँस जीवन" से )
-ओंम प्रकाश नौटियाल
झलक उसकी पाने को,
यूं ही छत पे जाता था,
घबरायी चोर नजरों से
उधर नजरें घुमाता था,
जाने किन खयालों में, मगर खोयी सी रहती थी,
बडी मासूम लगती थी मुझे सपनों में मिलती थी।
कभी इस ओर देखेगी
गीत मैं गुनगुनाता था,
कभी तो तंद्रा टूटेगी
पैर भी थपथपाता था ,
मगर कोने में बैठी वह, कुछ सोयी सी रहती थी,
बडी मासूम लगती थी मुझे सपनों में मिलती थी।
शीतल सर्द मौसम में
पवन सनसनाती थी,
वह जुल्फ़ें हटाती थी
चूडी खनक जाती थी,
दुपट्टे से ढ़क अंखियाँ , रोयी रोयी सी रहती थी,
बडी मासूम लगती थी मुझे सपनों में मिलती थी।
कभी कमरे को उसके,
मैंने रोशन नही देखा,
तम दूर करने का हो,
उसका मन, नहीं देखा,
अंधेरों को अंधेरों में , वह पिरोई सी रहती थी,
बडी मासूम लगती थी मुझे सपनों में मिलती थी।
एक दिन उधर घर से,
रोना सा सुन कर के,
झाँका जब वहाँ मैने,
छ्त पर चढ़ कर के,
खाली था पड़ा कोना, वह जहाँ सोयी सी रहती थी,
बडी मासूम लगती थी मुझे सपनों में मिलती थी।
उस दिन सुनी मैंने,
जो करुण कहानी थी,
उसकी मौत के पीछे,
सच्चाई वहशियानी थी,
गई खुद छोड दुनिया को, जो खोयी सी रहती थी,
बडी मासूम लगती थी मुझे सपनों में मिलती थी।
किसी दानवी दरिन्दे ने,
दिया जख्म था गहरा,
प्रताडित भी किया उल्टा,
मुरझाया भोला सा चेहरा,
चली ’धिक्कार’ , माँ जिन्दगी ढ़ोयी सी रहती है,
बडी मासूम लगती है मुझे सपनों में मिलती है।
(मेरी पुस्तक "साँस साँस जीवन" से )
Saturday, September 3, 2011
पुत्र प्रधान मंत्री कैसे बने?
-ओंम प्रकाश नौटियाल
पुत्र बनाना चाहते मंत्री यदि ’प्रधान’
लें अभी से आप ये बातें जरा जान,
बुरी लतों से आप अपना पुत्र बचायें
देखें कहीं उसे कि मुस्काना ना आये,
इस बात का भी हो पूरा पूरा ध्यान
यदाकदा बामुश्किल खोले वह जुबान,
सारे हों तिकड़मी उसके अपने मित्र
दागियों के बीच में चमके और चरित्र,
जीवन में अपनाये गर अहम ये सूत्र
तय है प्रधान मंत्री होगा आपका पुत्र,
पुत्र बनाना चाहते मंत्री यदि ’प्रधान’
लें अभी से आप ये बातें जरा जान,
बुरी लतों से आप अपना पुत्र बचायें
देखें कहीं उसे कि मुस्काना ना आये,
इस बात का भी हो पूरा पूरा ध्यान
यदाकदा बामुश्किल खोले वह जुबान,
सारे हों तिकड़मी उसके अपने मित्र
दागियों के बीच में चमके और चरित्र,
जीवन में अपनाये गर अहम ये सूत्र
तय है प्रधान मंत्री होगा आपका पुत्र,
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